झारखंड में पशु तस्करों के गिरोहों की सक्रियता चौंकाने वाली है. पिछले महीने खूंटी के तोरपा थाना क्षेत्र में 300 पशुओं को बांग्लादेश ले जाने के प्रयास का खुलासा होने के बाद पुनः नामकुम में 160 मवेशियों की बरामदगी के साथ सात तस्करों की गिरफ्तारी इस बात का संकेत देती है कि झारखंड पशु तस्करी का एक बड़ा केंद्र बनता जा रहा है. गौ हत्या पर कानूनन प्रतिबंध होने के बावजूद इसकी रोकथाम की दिशा में पुलिस-प्रशासन की भूमिका सवालों के घेरे में है. हर बार ऐसे मामले हिन्दू संगठनों की सक्रियता से ही उजागर हो पाते हैं. पशु क्रूरता निवारण के लिए एक सरकार प्रायोजित विभाग भी है जिसके आरक्षी निरीक्षक स्तर के अधिकारी जिला स्तर पर तैनात किये जाते हैं. लेकिन उनके जरिये कभी पशु तस्करी की कोई बड़ी खेप पकडे जाने का उदाहरण नहीं है. लावारिस या तस्करों के हाथों मुक्त कराये गए पशुओं को रखने के लिए कांजी हाउसों की भी उचित व्यवस्था नहीं है. निजी क्षेत्र का गोशाला नहीं हो तो पशुओं को रखना भी एक बड़ी समस्या है. सरकार की उदासीनता के कारण ही कट्टरपंथियों को साम्प्रदायिकता की आग भड़काने और स्वार्थ की रोटियां सेंकने का अवसर मिलता है.
नवल किशोर सिंह